संसार की सभी वस्तुएं जिन्हें हम अपना कहते हैं वास्तव में भगवान की हैं मूर्खतावश व्यक्ति उन पर अपना अधिकार जताता है और दुखी तथा त्रस्त होता है
Everything in this world that we call our own really belongs to God. One foolishly arrogates their ownership to oneself and thereby feels unhappy or miserable.
6.8.10
5.8.10
श्री साईं सच्चरित्र संदेश,
अगर सौभाग्यवश तुम्हे सत्संग प्राप्त हो जाए तो बिना किसी परिश्रम के तुम्हें आध्यात्मिक निर्देश प्राप्त होने लगेंगे और बुरी संगति के प्रति आकर्षण स्वत: समाप्त हो जाएगा I फलत: मन पूर्णत: सत्संग में मग्न हो जाएगा I
"If one is fortunate having in Satsang, then one understands the preaching easily. At that very moment desire for bad company will melt away. The mind will be free to enjoy the Satsang."
संदेश
स्वयम को सही मानने का स्वभाव और सही ठहराना साथ- साथ चलते है। यह बहुत खतरनाक आदत है। जब तक मनुष्य का स्वयम को सही मानने और ठहराने का स्वभाव रहेगा, वह ध्यान और आध्यात्मिकता की ओर नही बढ सकता।
Self-justification goes hand-in-hand with self-assertive nature. This is a very dangerous habit. A man can never grow in meditation and spirituality so long as he has self-assertive nature with the habit of self-justification.
Self-justification goes hand-in-hand with self-assertive nature. This is a very dangerous habit. A man can never grow in meditation and spirituality so long as he has self-assertive nature with the habit of self-justification.
4.8.10
SHIRDI SAI
श्री साईं सच्चरित्र संदेश,
"सत्संग तुम्हे शारीरिक लगाव से मुक्त कर देगा I उसकी शक्ति इतनी प्रभावशाली है की एक बार तुम स्वयं को पूर्ण लगन से उसमें समर्पित होकर तो देखो, तुम उसी क्षण सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाओगे" I
"Satsang destroys the bodily attachments. Such is the power of its strength. Once these is firm faith in it, there is truly liberation from the mundane world."
"सत्संग तुम्हे शारीरिक लगाव से मुक्त कर देगा I उसकी शक्ति इतनी प्रभावशाली है की एक बार तुम स्वयं को पूर्ण लगन से उसमें समर्पित होकर तो देखो, तुम उसी क्षण सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो जाओगे" I
"Satsang destroys the bodily attachments. Such is the power of its strength. Once these is firm faith in it, there is truly liberation from the mundane world."
संदेश
"वस्तुओं के उपयोग में उदार और परोपकारी बनो गरीब, बीमार और अभावग्रस्त लोगों की सेवा करो उनके ह्रदय में भगवान रहता है उनकी सेवा करके तुम ईश्वर की सेवा करोगे अत: उनके प्रति घ्रिना, दुर्भाव और ईर्ष्या की भावना मत रखो"
Be liberal and benevolent in the use of things. Serve the poor, the sick and the distressed who suffer from shortage. Their heart is the abode of God. By serving them you will serve God. Therefore do not have the feeling of hatred, malice and jealousy for them.
Be liberal and benevolent in the use of things. Serve the poor, the sick and the distressed who suffer from shortage. Their heart is the abode of God. By serving them you will serve God. Therefore do not have the feeling of hatred, malice and jealousy for them.
3.8.10
संदेश
अपने कष्ट के लिए दूसरों को जिम्मेवार ठहराना सबसे बड़ी भ्रान्ति है दूसरे के अवगुणों और अपने गुणों पर ध्यान मत दो जो अपने लिए कुछ नहीं चाहता, उस व्यक्ति को सब पसंद करते हैं
To regard another as the cause of one’s suffering is a delusion. Forget your virtues and other’s vices.One who desires nothing for himself is desired by all.
To regard another as the cause of one’s suffering is a delusion. Forget your virtues and other’s vices.One who desires nothing for himself is desired by all.
2.8.10
Shri Krishna Bhagavad Gita
You have the power to act only--
you do not have the power to influence the result--
...therefore you must act without the anticipation of the result--
without succumbing to inaction.
you do not have the power to influence the result--
...therefore you must act without the anticipation of the result--
without succumbing to inaction.
संदेश
गलत कार्य का परित्याग सही कार्य की शुरुआत है
बुराई से अच्छाई की ओर प्रस्थान बुराई का नाश है
बुरे कार्य को न दुहराना ही सबसे बड़ी अच्छाई है
Renunciation of wrong action spontaneously leads to right action. Returning good for evil destroys the evil. Not to repeat a bad deed is the best atonement.
बुराई से अच्छाई की ओर प्रस्थान बुराई का नाश है
बुरे कार्य को न दुहराना ही सबसे बड़ी अच्छाई है
Renunciation of wrong action spontaneously leads to right action. Returning good for evil destroys the evil. Not to repeat a bad deed is the best atonement.
1.8.10
श्री साईं सच्चरित्र संदेश,
धन्य धन्य है संतो की संगति I उनकी महिमा का वर्णन कौन कर सकता है I सदभक्तो को इससे विवेक और परम शांति की प्राप्ति होती है I
31.7.10
संदेश
जब हमारा मुकाबला कठिनाई, खतरों और असफलताओं से हो तब हम अपनी पूरी शक्ति से प्रार्थना करें और अपने कर्मों, विचारों तथा स्वयं में विशवास बनाए रखें
(Swami Paramananda)
(Swami Paramananda)
30.7.10
श्री साईं सच्चरित्र संदेश,
जो स्वयं को कफनी से ढंकता हो, जिस पर सौ पेबंद लगे हों, जिसकी गद्दी और बिस्तर बोरे का बना हो; और जिसका ह्रदय सभी प्रकार की भावनाओं से मुक्त हो, उसके लिये चाँदी के सिंहासन की क्या कीमत ?, इस प्रकार का कोई भी सिंहासन तो उनके लिये रुकावट ही होगा I फिर भी अगर भक्तगण पीछे से चुपचाप सरका कर उसे निचे लगा देते थे, तो बाबा उनकी प्रेम और भक्ति देखते हुए, उनकी इच्छा की आदरपूर्ति के लिए मना नहीं करते थे I
"Whose clothing is a patched up kafni; whose seat is sack cloth; whose mind is free of desires. what is a silver throne for him ?, Seeing the devotion of the devotees, he ignored the fact that they. after their difficulties were resolved turned their back on him. "
"Whose clothing is a patched up kafni; whose seat is sack cloth; whose mind is free of desires. what is a silver throne for him ?, Seeing the devotion of the devotees, he ignored the fact that they. after their difficulties were resolved turned their back on him. "
29.7.10
श्री साईं सच्चरित्र संदेश,
बुरा संग सदैव हानिकारक होता है; वह दुखों और कष्टों का घर होता है, जो बिना बताये तुम्हे कुमार्ग पर लाकर खड़ा कर देता है Iवह सभी सुखों का हरण कर लेता हैं I एसी बुरीसंगति के कारण होने वाली बर्बादी और पाप से साईनाथ या सदगुरु के अलवा और कौन रक्षा कर सकता हैं ?
"Bad company is absolutely harmful. It is the adobe of severe miseries. Unknowingly it would take you to the by-lanes, by-passing the highway of happiness. Without the one and only Sainath or without a Sadguru who else can purify the ill-effects of the bad company."
"Bad company is absolutely harmful. It is the adobe of severe miseries. Unknowingly it would take you to the by-lanes, by-passing the highway of happiness. Without the one and only Sainath or without a Sadguru who else can purify the ill-effects of the bad company."
28.7.10
(श्री मद भागवत गीता सार)
* क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है।
* जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
* तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।
* खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
* परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
* न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है - फिर तुम क्या हो?
* तुम अपने आपको भगवान के अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
* जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द अनुभव करेगा।
* जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
* तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।
* खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
* परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
* न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है - फिर तुम क्या हो?
* तुम अपने आपको भगवान के अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
* जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द अनुभव करेगा।
27.7.10
श्री साईं सच्चरित्र संदेश,
"अपनी चातुर्य के सभी तर्क छोड़ कर सदैव "साईं" स्मरण करो, तब तुम देखोगे कि तुम किस प्रकार निर्विघन भव सागर से पार उतर जाओगे ! इस विषय मे कोई संशय मत करना I"
"Abandoning all the million clever and cunning ways, recall always "Sai Sai". You will be able to cross the worldly ocean. Have no doubts"
"Abandoning all the million clever and cunning ways, recall always "Sai Sai". You will be able to cross the worldly ocean. Have no doubts"
26.7.10
श्री साईं सच्चरित्र संदेश,
सदगुरु के सानिन्ध्य में रहकर स्वयं को संसार के जंजालो से मुक्त कर लो I इसी मे तुम्हारा कल्याण है I इस विषय मे किसी प्रकार की शंका चित्त में न करो I
"Hold on to the good company of the Guru and the virtuous. Disentangle from the worldly ties. Definitely your fulfillment. Have no doubts."
"Hold on to the good company of the Guru and the virtuous. Disentangle from the worldly ties. Definitely your fulfillment. Have no doubts."
संदेश
जैसे हम सागर की जितनी गहराई मे जाएँगे,हम उसकी गहराई मे छुपे वो सारे रहस्यों को जानने मे सक्षम होते जाएगें जो उसकी गहराई मे छुपे हैं, ठीक वैसे नाम जाप करते हुए अपने अंदर बिराजमान सागर की जितनी गहराई मे उतरते जाएगें इस संसार को समझने मे हम उतने ही सक्षम होते जाएगें, मानस जून हम जीवो की असली मंजिल पाने की सीढ़ी का आखिरी चरण है,अगर नाम जाप की कमाई करते रहे तो मंजिल तक पहुँच जाएगें और फिसल गए तो फिर से इस जनम-मरण के चक्कर मे फंस जाएगें. जीव को कोशिश करनी चाहिए की वो नाम जाप करते हुए अपने सतगुरु का ही रूप बन जाए |
25.7.10
श्री साईं सच्चरित्र संदेश,
संत के सानिन्ध्य का महत्त्व अति महान है उससे अहंकार पूर्णत: नष्ट हो जाता है I कोई अन्य साधन सत्संग के समान प्रभावपूर्ण नहीं है I
"Such is the greatness of the Satsang that it completely destroy bodily pride or ego. Therefore there is no other means than Satsang."
"Such is the greatness of the Satsang that it completely destroy bodily pride or ego. Therefore there is no other means than Satsang."
23.7.10
22.7.10
॥जय श्री कृष्ण
लेना चाहते हो तो आशीर्वाद लो। देना चाहते हो तो अभय दान दो।
खाना चाहते हो तो क्रोध और गम को खाओ।
मारना चाहते हो तो बुरे विचारों को मारो।
जानना चाहते हो तो परमेश्वर को जानो।
जीतना चाहते हो तो तृष्णाओं को जीतो।
पीना चाहते हो तो ईश्वर चिन्तन का शर्बत पीओ।
पहनना चाहते हो तो नेकी का जामा पहनो।
करना चाहते हो तो दीन-दुखियोंकी सहायता करो।
छोड़ना चाहते हो तो झूठ बोलना छोड़ दो।
बोलना चाहते हो तो मीठे वचन बोलो।
तौलना चाहते हो तो अपनी वाणी को तौलो।
देखना चाहते हो तो अपने अवगुणों को देखो।
सुनना चाहते हो तो दुःखियोंकी पुकार सुनो।
पढ़ना चाहते हो तो महापुरुषोंकी जीवनी पढ़ो।
दर्शन करना चाहते हो तो देव दर्शन करो।
चलना चाहते हो तो सन्मार्ग पर चलो।
पहचानना चाहते हो तो अपने आप को पहचानो।
खाना चाहते हो तो क्रोध और गम को खाओ।
मारना चाहते हो तो बुरे विचारों को मारो।
जानना चाहते हो तो परमेश्वर को जानो।
जीतना चाहते हो तो तृष्णाओं को जीतो।
पीना चाहते हो तो ईश्वर चिन्तन का शर्बत पीओ।
पहनना चाहते हो तो नेकी का जामा पहनो।
करना चाहते हो तो दीन-दुखियोंकी सहायता करो।
छोड़ना चाहते हो तो झूठ बोलना छोड़ दो।
बोलना चाहते हो तो मीठे वचन बोलो।
तौलना चाहते हो तो अपनी वाणी को तौलो।
देखना चाहते हो तो अपने अवगुणों को देखो।
सुनना चाहते हो तो दुःखियोंकी पुकार सुनो।
पढ़ना चाहते हो तो महापुरुषोंकी जीवनी पढ़ो।
दर्शन करना चाहते हो तो देव दर्शन करो।
चलना चाहते हो तो सन्मार्ग पर चलो।
पहचानना चाहते हो तो अपने आप को पहचानो।
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